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छत्तीसगढ़: इको टूरिज्म कार्यशाला में पर्यटन व पर्यावरण संतुलन पर दिया गया जोर

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छत्तीसगढ़  Published by: Prabhesh Mishra , Date: 20/03/2026 12:24:45 pm Share:
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  • 20/03/2026 12:24:45 pm
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संक्षेप

छत्तीसगढ़: सूरजपुर जिले के शासकीय नवीन महाविद्यालय, प्रेमनगर में राष्ट्रीय उच्च शिक्षा अभियान के अंतर्गत आयोजित पाँच दिवसीय “इको टूरिज्म” कार्यशाला के चौथे दिन का सत्र “छत्तीसगढ़ में पर्यटन विकास के नए आयाम” विषय पर केंद्रित रहा।

विस्तार

छत्तीसगढ़: सूरजपुर जिले के शासकीय नवीन महाविद्यालय, प्रेमनगर में राष्ट्रीय उच्च शिक्षा अभियान के अंतर्गत आयोजित पाँच दिवसीय “इको टूरिज्म” कार्यशाला के चौथे दिन का सत्र “छत्तीसगढ़ में पर्यटन विकास के नए आयाम” विषय पर केंद्रित रहा। यह सत्र विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी सिद्ध हुआ, जिसमें पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन पर विशेष जोर दिया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. एच. एन. दुबे ने की। मुख्य अतिथि के रूप में नगर पंचायत अध्यक्ष श्रीमती सुखमनिया जगते एवं विशिष्ट अतिथि उपाध्यक्ष श्री आलोक साहू उपस्थित रहे। विषय विशेषज्ञों के रूप में डॉ. अखिलेश द्विवेदी और डॉ. अखिलेश पाण्डे एवं विनोद साहू ने अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का संचालन सह संयोजक श्री हीरालाल सिंह ने प्रभावशाली ढंग से किया। कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती एवं छत्तीसगढ़ महतारी के चित्रों के समक्ष दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना से हुई। इसके बाद छत्तीसगढ़ी राज्य गीत के सामूहिक गायन ने पूरे वातावरण को सांस्कृतिक ऊर्जा से भर दिया। अतिथियों का स्वागत तिलक, बैच और पुष्पगुच्छ के साथ किया गया।  स्वागत उदबोधन में सुश्री रेखा जायसवाल ने पर्यावरण संरक्षण को हमारा कर्तव्य बताते हुए कहा कि पर्यटन का विकास प्रकृति के संतुलन को ध्यान में रखकर ही होना चाहिए। उन्होंने “ग्रीन डेवलपमेंट” की अवधारणा पर जोर देते हुए जिम्मेदार पर्यटन की आवश्यकता बताई।


प्राचार्य डॉ. दुबे ने अपने उद्बोधन में कहा कि सरगुजा संभाग के चुनिंदा महाविद्यालयों में से इस महाविद्यालय में कार्यशाला का आयोजन होना गर्व की बात है। उन्होंने क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाओं की ओर संकेत करते हुए विद्यार्थियों को इसे रोजगार के अवसर के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया। श्री आलोक साहू ने अपने उद्बोधन में स्थानीय प्रशासन द्वारा पर्यटन विकास के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि पर्यटन क्षेत्र में आधारभूत सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।परंतु उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि “विकास” के नाम पर यदि प्राकृतिक धरोहरों को क्षति पहुँचाई जाती है, तो यह दीर्घकाल में हानिकारक सिद्ध होगा।मुख्य वक्ता डॉ. अखिलेश द्विवेदी ने अपने व्याख्यान में पर्यटन और पर्यावरण के बीच संबंध को वैज्ञानिक और संवैधानिक दृष्टिकोण से समझाया। उन्होंने कहा कि भारत के संविधान में पर्यावरण संरक्षण को नागरिकों का मूल कर्तव्य माना गया है, इसलिए प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करे। उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे पर्यटन स्थलों का विकास होता है, वहाँ मानव गतिविधियाँ बढ़ती हैं, जिससे भूमि, जल और जैव विविधता पर दबाव पड़ता है। यदि इस दबाव को नियंत्रित नहीं किया गया, तो पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ सकता है। उन्होंने “सस्टेनेबल टूरिज्म” की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि हमें ऐसे पर्यटन मॉडल को अपनाना चाहिए, जिसमें संसाधनों का उपयोग सीमित और संतुलित हो, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इन प्राकृतिक धरोहरों का लाभ उठा सकें। विषय विशेषज्ञ डॉ. साहू ने पर्यटन को रोजगार और आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पर्यटन केवल घूमने-फिरने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक उद्योग है, जिसमें परिवहन, होटल प्रबंधन, टूर गाइड, हस्तशिल्प, स्थानीय उत्पाद और सांस्कृतिक गतिविधियाँ शामिल हैं। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक सुंदरता, जलप्रपात, वन क्षेत्र और सांस्कृतिक विविधता जैसे अनेक आकर्षण मौजूद हैं, जिन्हें व्यवस्थित रूप से विकसित कर युवाओं के लिए रोजगार के अवसर उत्पन्न किए जा सकते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि वे पर्यटन क्षेत्र में कौशल विकसित करें और स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ें। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि पर्यटन के विकास में स्थानीय समुदाय की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है।
           


द्वितीय सत्र डॉ. पाण्डे ने अपने व्याख्यान में मानव और प्रकृति के संबंध पर गहन विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास की दौड़ में मानव ने प्रकृति का अत्यधिक दोहन किया है, जिसके परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता में कमी और प्राकृतिक आपदाओं की संख्या में वृद्धि हो रही है। उन्होंने इको टूरिज्म को एक ऐसा माध्यम बताया, जो विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है। उन्होंने कहा कि “हमें प्रकृति से उतना ही लेना चाहिए, जितनी हमारी वास्तविक आवश्यकता हो, न कि लालच के आधार पर।” उन्होंने पर्यटकों और स्थानीय लोगों को जागरूक करते हुए कहा कि पर्यटन स्थलों पर अनुशासन, स्वच्छता और संसाधनों के संरक्षण को प्राथमिकता देनी चाहिए। यदि हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखेंगे, तो ही सतत विकास संभव होगा। इस कार्यक्रम के अंत में कार्यशाला के आयोजक सचिव श्री हरिशंकर ने  सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया तथा अतिथियों को स्मृति चिन्ह एवं प्रमाण पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के सफल संचालन में महाविद्यालय के अन्य सदस्यों में कार्यक्रम के संयुक्त सचिव श्री रविशंकर उर्रे, इसके अलावा मनबोध कुजूर, श्री जयशंकर, श्री अमित कुमार, श्री शेषनन्दन टेकाम, श्री डंकेश्वर वर्मन, सोनाली किंडो, श्रीमती पुनीता राजवाड़े, सुश्री अन्नू सिंह, डॉ. संजय वर्मा सहित श्रीमती सुभिया सिंह, किशुन, तथा चंद्रशेखर का सराहनीय योगदान रहा।