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मध्य प्रदेश: लोकतंत्र मजबूत करने के लिए चुनावी न्यूनतम योग्यता परीक्षा की करी  गई मांग

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मध्य प्रदेश   Published by: Kamal Patni , Date: 07/02/2026 12:43:55 pm Share:
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  • 07/02/2026 12:43:55 pm
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संक्षेप

मध्य प्रदेश: भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमें इस पर गर्व भी है।

विस्तार

मध्य प्रदेश: भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमें इस पर गर्व भी है। लेकिन इसी लोकतंत्र के भीतर आज एक ऐसा विरोधाभास पनप रहा है, जो न केवल चौंकाता है बल्कि डराता भी है। चपरासी बनने के लिए परीक्षा अनिवार्य है। क्लर्क बनने के लिए परीक्षा अनिवार्य है। ड्राइवर बनने के लिए परीक्षा और प्रशिक्षण अनिवार्य है। लेकिन देश, प्रदेश, ज़िला और गांव चलाने वालों के लिए — कोई अनिवार्य योग्यता नहीं, जो व्यक्ति संविधान की मूल भावना नहीं जानते, जिन्हें कानून और प्रशासन की बुनियादी समझ नहीं है, जो लोकतांत्रिक दायित्वों से अपरिचित हैं। वे भी चुनाव लड़ सकते हैं और देश की दिशा तय कर सकते हैं। यह सवाल केवल व्यवस्था पर नहीं, हमारी सामूहिक चुप्पी पर भी है, जब छोटी नौकरी के लिए योग्यता, तो देश चलाने के लिए क्यों नहीं। एक मामूली सरकारी पद के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता, परीक्षा और प्रशिक्षण आवश्यक माना जाता है। परंतु संसद, विधानसभा और स्थानीय निकायों में पहुंचने के लिए संविधान, कानून और शासन प्रणाली का ज्ञान अनिवार्य नहीं। क्या यह लोकतंत्र को मज़बूत करता है या उसे कमजोर करता है।

 

लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं होता। लोकतंत्र का अर्थ होता है जिम्मेदारी, समझ और जवाबदेही। योग्यता परीक्षा : लोकतंत्र के विरुद्ध नहीं, लोकतंत्र के पक्ष में यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि चुनाव लड़ने से पहले एक अनिवार्य लिखित योग्यता परीक्षा की मांग। किसी राजनीतिक दल के विरुद्ध नहीं है। किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं है। बल्कि यह मांग है। लोकतंत्र को मज़बूत करने की, जवाबदेह नेतृत्व तैयार करने की और संविधान की गरिमा बनाए रखने की, यह परीक्षा केवल यह जांचे कि प्रत्याशी को संविधान की बुनियादी समझ है या नहीं। लोकतंत्र और शासन प्रणाली का ज्ञान है या नहीं और कानून व प्रशासन की प्राथमिक जानकारी है या नहीं, जो इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो, वही चुनावी प्रक्रिया में भाग ले। यह अयोग्यता नहीं, न्यूनतम योग्यता की बात है। नीति-निर्धारण और प्रशासन पर भी ज़रूरी सवाल। यह सवाल केवल जनप्रतिनिधियों तक सीमित नहीं है। नीति-निर्धारण के स्तर पर भी कुछ बुनियादी प्रश्न खड़े होते हैं। प्रशासनिक अधिकारियों के पास न्यायिक प्रकृति की शक्तियाँ क्यों हैं।