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राजस्थान: कांग्रेस का प्रदर्शन, नितिन नबीन के बयान पर लोगो ने किया पुतला दहन
- Photo by : social media
संक्षेप
राजस्थान: जिला कांग्रेस कमेटी टोंक के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने मंगलवार को घंटाघर पर नितिन नबीन के पुतले का दहन किया।सोमवार को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने टोंक विधायक सचिन पायलट पर अभद्र टिप्पणी करना भारी पड़ गया।
विस्तार
राजस्थान: जिला कांग्रेस कमेटी टोंक के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने मंगलवार को घंटाघर पर नितिन नबीन के पुतले का दहन किया।सोमवार को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने टोंक विधायक सचिन पायलट पर अभद्र टिप्पणी करना भारी पड़ गया। टोंक में भाजपा कार्यालय उद्घाटन के मंच से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की जुबान से निकला एक शब्द—“बहरूपिया”,अब केवल एक बयान नहीं, बल्कि राजस्थान की राजनीति का बड़ा विमर्श बन चुका है। भाजपा नेता राधामोहन अग्रवाल द्वारा विधायक सचिन के लिए इस शब्द के प्रयोग ने राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ा दिया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जगह-जगह विरोध प्रदर्शन किए, पुतले जलाए और इसे व्यक्तिगत नहीं, बल्कि जनता के सम्मान पर हमला बताया। लेकिन सवाल सिर्फ एक शब्द का नहीं है, सवाल यह है कि क्या राजनीति अब विचारों से ज्यादा व्यक्तिगत कटाक्षों पर टिक गई है? राजनीति में विरोध नया नहीं है, लेकिन जब विरोध भाषा की मर्यादा पार कर जाता है, तब मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और बयान सुर्खियां बन जाते हैं। यही इस पूरे घटनाक्रम में भी देखने को मिला। विकास, रोजगार, सड़क, पानी और जनता के असली सवाल पीछे रह गए, और एक शब्द पूरे प्रदेश की बहस बन गया। पायलट राजस्थान की राजनीति का वह चेहरा हैं, जिन्हें चाहने वाले केवल समर्थक नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से जुड़े लोग भी हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी भले उनसे दूर रही हो, लेकिन जनसमर्थन की जमीन आज भी उनके साथ खड़ी दिखाई देती है। यही वजह है कि उनके खिलाफ बोले गए शब्द तुरंत जनता की प्रतिक्रिया बन जाते हैं। राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है—कुर्सी से बड़ा जनमत होता है। कोई नेता पद से बड़ा नहीं बनता, बल्कि जनता उसे बड़ा बनाती है। सचिन पायलट के मामले में यही बार-बार दिखाई देता है। विरोधी जितना हमला करते हैं, समर्थकों की आवाज उतनी तेज़ हो जाती है। यह भी सच है कि कई बार विरोधी का एक बयान, नेता की लोकप्रियता को और बढ़ा देता है। राजनीति में बदनाम होना भी कभी-कभी प्रसिद्ध होने का सबसे तेज़ रास्ता बन जाता है। एक तीखा शब्द विरोधी को कमजोर नहीं, कई बार और मजबूत कर देता है। नेताओं को यह समझना होगा कि जनता अब केवल भाषण नहीं सुनती, शब्दों का वजन भी तौलती है। सोशल मीडिया के दौर में एक बयान सेकंडों में लाखों लोगों तक पहुंचता है। वहां जनता सिर्फ सुनती नहीं, फैसला भी तुरंत करती है। आज सवाल राधामोहन अग्रवाल या सचिन पायलट का नहीं है। सवाल राजनीति की उस गिरती भाषा का है, जहां तर्क की जगह तंज और संवाद की जगह कटाक्ष लेता जा रहा है। क्योंकि इतिहास गवाह है—नेता भाषणों से नहीं, अपने शब्दों की गरिमा से याद रखे जाते हैं। अब सवाल आपसे— क्या राजनीति में इस तरह की भाषा सही है? क्या विरोध के लिए व्यक्तिगत टिप्पणी जरूरी है? या फिर ऐसे बयान ही नेताओं की असली पहचान बन जाते हैं? इस पर कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा ने भी भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि पायलट को लेकर राजस्थान भाजपा प्रभारी और राज्य सभा सांसद राधा मोहन दास ने जो टिप्पणी की है वह भाजपा की गिरती हुई सियासी संस्कृति को दर्शाती है।साथ ही यह भी कहा कि वैचारिक मतभेद हो सकते हैं। लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणी और मर्यादा का उल्लघंन बर्दाश्त नही किया जाएगा भाजपा लोकतांत्रिक संस्कारों को कमजोर कर रही है।
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