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उत्तर प्रदेश: एम्स में पहली लैप्रोस्कोपिक पाइलोप्लास्टी सफल, मरीज को नई मिली जिंदगी
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संक्षेप
उत्तर प्रदेश: Ureteropelvic Junction Obstruction (पीयूजे ऑब्स्ट्रक्शन) वह स्थिति है जिसमें किडनी के रीनल पेल्विस से मूत्रवाहिनी (यूरेटर) में मूत्र का प्रवाह आंशिक या पूर्ण रूप से बाधित हो जाता है।
विस्तार
उत्तर प्रदेश: Ureteropelvic Junction Obstruction (पीयूजे ऑब्स्ट्रक्शन) वह स्थिति है जिसमें किडनी के रीनल पेल्विस से मूत्रवाहिनी (यूरेटर) में मूत्र का प्रवाह आंशिक या पूर्ण रूप से बाधित हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप किडनी में सूजन (हाइड्रोनेफ्रोसिस) विकसित हो जाती है और यदि लंबे समय तक इसका उपचार न किया जाए तो किडनी की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। 46 वर्षीय एक महिला मरीज पेट में रुक-रुक कर होने वाले दर्द की शिकायत लेकर All India Institute of Medical Sciences Gorakhpur के जनरल सर्जरी विभाग में डॉ धर्मेन्द्र कुमार पिपल, एसोसिएट प्रोफेसर, की सर्जिकल ओपीडी में आईं। प्रारंभिक जांचों के दौरान सीटी स्कैन में दाहिनी किडनी अत्यधिक फैली हुई (डायलेटेड) पाई गई, जो लंबे समय से अवरोध की ओर संकेत कर रही थी। आगे की जांच में डीटीपीए स्कैन से यह पता चला कि दाहिनी किडनी की कार्यक्षमता केवल 20 प्रतिशत रह गई है। इन निष्कर्षों के आधार पर मरीज में पीयूजे ऑब्स्ट्रक्शन की पुष्टि हुई और उसके उपचार के लिए पाइलोप्लास्टी सर्जरी की योजना बनाई गई। ऑपरेशन के दौरान यह पाया गया कि किडनी के निचले ध्रुव को रक्त पहुंचाने वाली एक असामान्य (एबरेंट) रक्त वाहिका पीयूजे के ऊपर से गुजर रही थी और उसी के कारण उस स्थान पर दबाव पड़ रहा था, जिससे मूत्र के प्रवाह में रुकावट उत्पन्न हो रही थी। इस रक्त वाहिका का संरक्षण अत्यंत आवश्यक था, क्योंकि यह किडनी के महत्वपूर्ण हिस्से को रक्त आपूर्ति कर रही थी। इसलिए इसे काटना संभव नहीं था। इस स्थिति में पीयूजे को सावधानीपूर्वक काटकर उसे उस रक्त वाहिका के सामने पुनः जोड़कर नया मार्ग बनाया गया, जिससे उस पर पड़ रहा दबाव समाप्त हो गया और मूत्र का प्रवाह सामान्य हो सके। यह पूरी जटिल पुनर्निर्माण प्रक्रिया लैप्रोस्कोपिक तकनीक से सफलतापूर्वक की गई, जिसके लिए उच्च स्तर की सर्जिकल दक्षता, अनुभव और सूक्ष्म तकनीकी कौशल की आवश्यकता होती है। पूर्व में इस प्रकार की सर्जरी पसलियों के नीचे लंबा चीरा लगाकर (ओपन सर्जरी) की जाती थी, जिसमें ऑपरेशन के बाद अधिक दर्द, घाव में संक्रमण या पस बनने का खतरा, लंबे समय तक बिस्तर पर आराम, कभी-कभी रक्त चढ़ाने की आवश्यकता तथा भविष्य में चीरे के स्थान पर हर्निया बनने की संभावना रहती थी। जबकि लैप्रोस्कोपिक पद्धति में छोटे-छोटे छिद्रों के माध्यम से सर्जरी की जाती है, जिससे मरीज को कम दर्द होता है, घाव संबंधी जटिलताएं कम होती हैं, अस्पताल में रहने की अवधि घटती है और मरीज जल्दी सामान्य जीवन में लौट सकता है। यह सर्जरी डॉ धर्मेन्द्र कुमार पिपल, एसोसिएट प्रोफेसर, जनरल सर्जरी द्वारा की गई। सर्जिकल टीम में सीनियर रेजिडेंट डॉ सलमान खान तथा जूनियर रेजिडेंट डॉ एलन फिलिप शामिल थे। यह ऑपरेशन जनरल सर्जरी विभाग के अतिरिक्त प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ गौरव गुप्ता के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। एनेस्थीसिया टीम में डॉ प्रियंका द्विवेदी, सीनियर रेजिडेंट डॉ प्रियंका तथा जूनियर रेजिडेंट डॉ उर्वशी शामिल रहीं, जिन्होंने पूरे ऑपरेशन के दौरान सुरक्षित एनेस्थीसिया प्रबंधन सुनिश्चित किया। ऑपरेशन के दौरान नर्सिंग देखभाल मिस सुष्मिता द्वारा प्रदान की गई, जिनके सहयोग से पूरी प्रक्रिया सुचारु रूप से संपन्न हो सकी। एम्स गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक Retired Major General Prof Dr Vibha Dutta ने इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर सर्जिकल टीम को बधाई देते हुए कहा कि एम्स गोरखपुर निरंतर आधुनिक और उन्नत चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि लैप्रोस्कोपिक जैसी न्यूनतम इनवेसिव तकनीकों के माध्यम से मरीजों को कम दर्द, कम जटिलताओं और शीघ्र स्वास्थ्य लाभ का लाभ मिलता है। उन्होंने सर्जरी विभाग के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार की जटिल सर्जरी का सफलतापूर्वक संपादन संस्थान की बढ़ती विशेषज्ञता, टीमवर्क और तकनीकी क्षमता को दर्शाता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि एम्स गोरखपुर भविष्य में भी नई और उन्नत सर्जिकल तकनीकों को अपनाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा आसपास के क्षेत्रों के मरीजों को उच्च गुणवत्ता की स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करता रहेगा। एम्स गोरखपुर में पीयूजे ऑब्स्ट्रक्शन के लिए पहली लैप्रोस्कोपिक पाइलोप्लास्टी का सफलतापूर्वक किया जाना संस्थान में उन्नत और न्यूनतम इनवेसिव सर्जरी सेवाओं के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
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