-
☰
मध्य प्रदेश: OPS से रतलाम संपत्ति विवाद तक, क्या प्रशासनिक अहंकार पर भारी पड़ पाएगा कानून
- Photo by :
संक्षेप
मध्य प्रदेश: देश में आज पुरानी पेंशन योजना OPS और नई पेंशन योजना NPS को लेकर व्यापक बहस चल रही है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: देश में आज पुरानी पेंशन योजना OPS और नई पेंशन योजना NPS को लेकर व्यापक बहस चल रही है। सरकारी कर्मचारी यह प्रश्न उठा रहे हैं कि यदि दशकों की सेवा के बाद भी उनकी सुनिश्चित पेंशन व्यवस्था बदली जा सकती है, तो क्या जनप्रतिनिधियों की पेंशन व्यवस्था पर भी समान सिद्धांत लागू नहीं होने चाहिए। इसी बहस के बीच रतलाम में रियासतकालीन निजी संपत्तियों और उनसे जुड़े प्रशासनिक विवादों ने एक और गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है। क्या प्रशासनिक तंत्र स्वयं को कानून, न्यायालय और ऐतिहासिक अभिलेखों से ऊपर मानने लगा है। रतलाम के सुरजपोल, लोकेन्द्र भवन तथा अन्य रियासतकालीन संपत्तियों से जुड़े अनेक प्रकरण वर्षों से विवादों और मुकदमेबाजी में उलझे हुए हैं। कई मामलों में न्यायालयों द्वारा निजी स्वामित्व स्वीकार किया गया, प्रशासनिक अभिलेख उपलब्ध रहे, नगर निगम स्तर पर अनुमतियाँ जारी हुईं, नागरिकों ने वैध रूप से संपत्तियाँ खरीदीं, निर्माण किये और करों का भुगतान भी किया। इसके बावजूद समय-समय पर पुनः उन्हीं संपत्तियों को शासकीय बताने के प्रयास किये जाते रहे। यही स्थिति प्रशासनिक हठधर्मिता Administrative Arbitrariness का सबसे बड़ा उदाहरण मानी जा रही है। एम. सी. सिंगला प्रकरण जैसे मामलों में भी यही मूल प्रश्न सामने आता है कि यदि न्यायालयों, अभिलेखों और पूर्व प्रशासनिक कार्यवाहियों में किसी संपत्ति के अधिकार स्पष्ट हो चुके हैं, तो फिर वर्षों बाद बार-बार विवाद उत्पन्न करने का औचित्य क्या है। सबसे गंभीर पहलू यह है कि ऐसी प्रशासनिक कार्यवाहियों का आर्थिक भार अंतत जनता पर ही पड़ता है। आधारहीन अपीलें, अनावश्यक मुकदमे, वर्षों तक चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया, इन सबका खर्च सरकारी खजाने से होता है, और सरकारी खजाना वास्तव में जनता के टैक्स से चलता है। यानी जनता का धन खर्च होता है, जनता का समय नष्ट होता है और अंतत पीड़ित भी वही नागरिक बनते हैं जिन्होंने वैध रूप से संपत्ति खरीदी होती है। ठीक इसी प्रकार OPS और NPS की बहस में भी कर्मचारियों का मूल प्रश्न समानता और जवाबदेही का है। जब कर्मचारियों से कहा जाता है कि सरकार पर वित्तीय भार अधिक है, इसलिए OPS समाप्त करनी पड़ी, तब जनता यह भी पूछ रही है कि क्या यही वित्तीय अनुशासन नेताओं और विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों पर भी लागू होगा। क्या प्रशासनिक गलतियों और हठधर्मिता का आर्थिक भार कभी अधिकारियों से वसूला जाएगा। क्या जनता का पैसा अंतहीन मुकदमेबाजी और प्रशासनिक जिद में खर्च होता रहेगा। लोकतंत्र में प्रशासन का कार्य नागरिकों को सुविधा और न्याय देना है, न कि उन्हें वर्षों तक विवादों में उलझाना। यदि न्यायालयों के आदेशों की अनदेखी हो, पूर्व रिकॉर्ड के विपरीत कार्यवाही हो, समय आ गया है कि न्यायालयीन आदेशों का वास्तविक सम्मान सुनिश्चित हो, प्रशासनिक विरोधाभासों की जवाबदेही तय हो, आधारहीन मुकदमों और अपीलों पर नियंत्रण हो, तथा सार्वजनिक धन की बर्बादी करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध आर्थिक उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाये। लोकतंत्र में कानून सर्वोच्च होना चाहिए, न कि प्रशासनिक अहंकार और जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक चाहे OPS का प्रश्न हो या रतलाम की रियासतकालीन संपत्तियों का जनता के मन में असंतोष और अविश्वास बढ़ता ही रहेगा।
एक विभाग अनुमति दे और दूसरा उसी को अवैध बताये, तथा गलत निर्णयों के बावजूद अधिकारियों की कोई व्यक्तिगत जवाबदेही तय न हो, तो जनता के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ना स्वाभाविक है। रतलाम की रियासतकालीन संपत्तियों से जुड़े विवाद आज केवल भूमि विवाद नहीं रह गये हैं। वे इस बात की परीक्षा बन चुके हैं कि क्या लोकतांत्रिक शासन वास्तव में Rule of Law अर्थात विधि शासन पर चलता है, या फिर प्रशासनिक शक्ति और हठधर्मिता पर। आज आवश्यकता केवल न्यायालयीन निर्णयों की नहीं, बल्कि प्रशासनिक उत्तरदायित्व की भी है।
राजस्थान: अवैध बजरी खनन रोकना बनी पहली प्राथमिकता, साइबर अपराधियों पर भी होगी सख्त कार्रवाई
राजस्थान: पुलिस का बड़ा एक्शन, अवैध शराब, सट्टा और साइबर ठगों पर कड़ा शिकंजा
उत्तर प्रदेश: ग्रामीण पत्रकारों की एकजुटता, भारतीय ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन ने गठन का किया ऐलान
राजस्थान: ग्राम पंचायत में समस्याओं को लेकर ग्रामीणों ने दिया धरना, आश्वासन के बाद होगा खत्म
राजस्थान: भाजपा एससी मोर्चा जिलाध्यक्ष बनने पर मनीष बैरवा का हुआ सम्मान, संगठन मजबूती पर दिया जोर
उत्तर प्रदेश: माँ शाकंभरी देवी क्षेत्र में तेज जलप्रवाह से हुआ हादसा, प्रशासन अलर्ट पर