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मध्य प्रदेश: RTI पर सवाल या पारदर्शिता पर चोट, सूचना अधिकार को मजबूत करने की उठी मांग
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: सूचना का अधिकार (RTI) कानून देश के नागरिकों को शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए दिया गया एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: सूचना का अधिकार (RTI) कानून देश के नागरिकों को शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए दिया गया एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार है। ऐसे में यदि किसी न्यायिक टिप्पणी में यह कहा जाता है कि “RTI एक्टिविज्म नया बिजनेस बन गया है”, तो यह टिप्पणी अनेक गंभीर प्रश्न खड़े करती है। यदि किसी व्यक्ति विशेष ने कानून का दुरुपयोग किया है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई होना स्वाभाविक और आवश्यक है। परंतु कुछ मामलों के आधार पर पूरे RTI आंदोलन या सभी RTI कार्यकर्ताओं को संदेह की दृष्टि से देखना उचित नहीं माना जा सकता। यदि वास्तव में RTI को “बिजनेस” कहा जा रहा है, तो इसके समर्थन में ठोस तथ्य और प्रमाण भी प्रस्तुत होने चाहिए। अन्यथा ऐसी टिप्पणियाँ ईमानदारी से सूचना मांगने वाले नागरिकों का मनोबल कमजोर कर सकती हैं। देश में अनेक घोटाले, अनियमितताएँ और प्रशासनिक कमियाँ RTI के माध्यम से ही उजागर हुई हैं। यदि अधिकारियों को यह संदेश जाने लगे कि सूचना न देने या देरी करने पर कोई प्रभावी दंड नहीं होगा, तो पारदर्शिता का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है। इससे भ्रष्ट और लापरवाह अधिकारियों के हौसले बढ़ने की आशंका भी व्यक्त की जा सकती है। आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि RTI में निर्धारित समय-सीमा के भीतर जानकारी नहीं मिलने पर भी दंडात्मक कार्रवाई विरले ही दिखाई देती है। प्रथम अपील और द्वितीय अपील की लंबी प्रक्रिया कई बार आवेदक को वर्षों तक भटकाती रहती है। इससे कानून का उद्देश्य प्रभावित होता है।
निर्धारित समय-सीमा में सूचना न देने पर दंडात्मक प्रावधानों का कठोर और अनिवार्य पालन हो। सूचना आयोगों में लंबित मामलों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित किया जाए। प्रथम और द्वितीय अपील की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और परिणामोन्मुख बनाया जाए।
जानबूझकर सूचना रोकने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। अधिकतम सरकारी सूचनाएँ स्वतः सार्वजनिक (Proactive Disclosure) की जाएँ ताकि RTI आवेदन की आवश्यकता ही कम पड़े। लोकतंत्र में सूचना का अधिकार केवल एक कानून नहीं, बल्कि नागरिकों और शासन के बीच विश्वास का सेतु है। इसलिए किसी भी प्रकार की टिप्पणी या व्यवस्था ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे यह संदेश जाए कि पारदर्शिता की मांग करना संदेहास्पद गतिविधि है। साथ ही, यह भी आवश्यक है कि RTI का उपयोग जनहित में हो और उसका दुरुपयोग न होने पाए। पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों का संतुलन ही सुशासन की आधारशिला है।
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