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मध्य प्रदेश: RTI में पारदर्शिता जरूरी, सूचना रोकने पर न्यायपालिका सख्त
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: हाल ही में न्यायपालिका द्वारा सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की धारा 8(1)(h) और 8(1)(j) के दुरुपयोग पर जताई गई गंभीर चिंता के बाद पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: हाल ही में न्यायपालिका द्वारा सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की धारा 8(1)(h) और 8(1)(j) के दुरुपयोग पर जताई गई गंभीर चिंता के बाद पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। न्यायपालिका ने स्पष्ट किया है कि केवल सामान्य, अस्पष्ट या रूटीन कारणों का हवाला देकर किसी नागरिक को सूचना से वंचित नहीं किया जा सकता। इस फैसले को लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिकों को शासन और प्रशासन से जवाब मांगने का कानूनी अधिकार देता है। यह कानून केवल दस्तावेज प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, प्रशासनिक जवाबदेही और सुशासन की मजबूत आधारशिला माना जाता है। हालांकि, कई विभागों में आज भी धारा 8(1)(h) यानी “जांच में बाधा” और धारा 8(1)(j) यानी “व्यक्तिगत सूचना” का हवाला देकर जानकारी देने से बचने की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि कानून का उद्देश्य अपवादों का विस्तार करना नहीं, बल्कि नागरिकों को अधिकतम सूचना उपलब्ध कराना है। विशेष रूप से भूमि एवं राजस्व मामलों में नागरिकों को सबसे अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वर्षों पुराने भूमि रिकॉर्ड, नामांतरण, सीमांकन, भू-अभिलेख सुधार, नजूल भूमि, आवंटन आदेश और दस्तावेजों में कथित गड़बड़ियों से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने में लोगों को अनावश्यक देरी और तकनीकी अड़चनों का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में सूचना उपलब्ध होने के बावजूद उसे देने में टालमटोल की शिकायतें सामने आती रही हैं। कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि किसी सरकारी निर्णय, भूमि रिकॉर्ड, निर्माण कार्य, वित्तीय व्यय या प्रशासनिक कार्रवाई का संबंध सार्वजनिक हित से है, तो ऐसी सूचनाओं को सामान्यतः गोपनीयता के दायरे में नहीं रखा जा सकता। सरकारी अभिलेख जनता के धन से तैयार होते हैं और अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। विशेषज्ञों ने RTI व्यवस्था को और प्रभावी बनाने के लिए कई सुझाव दिए हैं। इनमें RTI आवेदनों का समयबद्ध निस्तारण, सूचना अस्वीकार करने के स्पष्ट और तथ्यात्मक कारण, जानबूझकर सूचना छिपाने वाले अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई, भूमि एवं राजस्व अभिलेखों का पूर्ण डिजिटलीकरण, सूचना आयोगों में लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा तथा अधिकारियों को पारदर्शिता के प्रति संवेदनशील बनाना शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में पारदर्शिता कोई उपकार नहीं, बल्कि नागरिकों का अधिकार है। सूचना छिपाने की संस्कृति प्रशासनिक व्यवस्था को कमजोर करती है, जबकि खुलापन और जवाबदेही जनता का विश्वास मजबूत करते हैं। ऐसे में RTI को अपवादों के जाल में उलझाने के बजाय जनहित और सुशासन का प्रभावी माध्यम बनाए जाने की आवश्यकता है।
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