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मध्य प्रदेश: नगर परिषद में 3 करोड़ की खरीदी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, जांच शुरू

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मध्य प्रदेश  Published by: Durgesh Kumar Gupta , Date: 27/04/2026 11:41:12 am Share:
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  • 27/04/2026 11:41:12 am
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संक्षेप

मध्य प्रदेश: शहडोल मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं।

विस्तार

मध्य प्रदेश: शहडोल मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण शहडोल जिले की नगर परिषद खांड (बाणसागर) में देखने को मिल रहा है। यहाँ के मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) पर आरोप है कि उन्होंने निकाय के तकनीकी अमले यानी उपयंत्री को पूरी तरह बायपास करते हुए, सरकारी नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर लगभग 3 करोड़ रुपये की सामग्री खरीदी में भारी वित्तीय अनियमितता की है। मामले की गंभीरता को देखते हुए संचालनालय, नगरीय प्रशासन एवं विकास, भोपाल ने जांच कमेटी तो गठित कर दी है, लेकिन जांच की निष्पक्षता पर अभी से सवालिया निशान लगने शुरू हो गए हैं।

क्या है पूरा मामला और घोटाला?

प्राप्त दस्तावेजों और शिकायतों के विश्लेषण से पता चलता है कि नगर परिषद खांड में पिछले करीब चार महीनों के भीतर विभिन्न सामग्रियों की थोक में खरीदी की गई। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता को ताक पर रखकर 'फिक्स्ड टेंडरिंग' का खेल खेला गया। आरोप है कि निविदा (टेंडर) प्रक्रिया में ऐसी 'अजीबोगरीब' और 'अनाप-शनाप' शर्तें जोड़ी गईं, जिससे केवल चुनिंदा और पसंदीदा सप्लायर ही दौड़ में शामिल हो सकें। घोटाले का मुख्य केंद्र बिंदु बाजार दर से कई गुना अधिक कीमतों पर सामान खरीदना है। शिकायत के अनुसार, जो सामग्री बाजार में सामान्य दरों पर उपलब्ध थी, उसे चहेते ठेकेदारों से ऊँची दरों पर खरीदा गया। खरीदी गई सामग्रियों की सूची काफी लंबी है, जिसमें 4 पानी के टैंकर, 5 इलेक्ट्रिक ऑटो कचरा वाहन, सोलर पैनल इंस्टालेशन, तिरंगा लाइट, गेट वाल्व, हैंडपंप सामग्री, स्वच्छता हेतु रासायनिक सामग्री (लिक्विड एवं ब्लीचिंग पाउडर), ओपन जिम उपकरण, सीसीटीवी कैमरे, एल.पी. शीट और कंक्रीट कुर्सियां शामिल हैं। इन सभी की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं।


शिकायतकर्ता और कार्यवाही की शुरुआत

इस भ्रष्टाचार का खुलासा तब हुआ जब जबलपुर के सिहोरा निवासी जागरूक नागरिक प्रवीण तिवारी ने शासन के समक्ष मोर्चा खोला। उन्होंने 21 अप्रैल 2026 को आयुक्त, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग, भोपाल के समक्ष साक्ष्यों के साथ लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया कि किस तरह जेम (GeM) पोर्टल के प्रावधानों को दरकिनार किया गया और प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया को कुचला गया। इस शिकायत के आधार पर विभाग ने तत्काल कार्यवाही करते हुए अगले ही दिन 22 अप्रैल 2026 को जांच के आदेश जारी कर दिए।

जांच कमेटी का गठन और 'हितों का टकराव'

भोपाल से जारी आदेश (क्रमांक/शा.-7/2026/6054) के तहत तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया है। इस समिति में शहडोल संभाग के संभागीय कार्यपालन यंत्री अरविन्द शर्मा को अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि रीवा नगर निगम के कार्यपालन यंत्री सिद्धार्थ सिंह और नरसिंहपुर के उपयंत्री प्रमोद बिन्द्रा को सदस्य नियुक्त किया गया है। समिति को निर्देशित किया गया है कि वह एक सप्ताह के भीतर जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करे। यहीं से विवाद की स्थिति निर्मित होती है। नगर परिषद खांड, शहडोल संभाग के अंतर्गत आती है और जिस समय यह करोड़ों का कथित घोटाला अंजाम दिया जा रहा था, उस समय संभाग की निगरानी की जिम्मेदारी इन्हीं संभागीय अधिकारियों की थी। अब जब उसी कार्यालय के मुखिया को जांच समिति का अध्यक्ष बनाया गया है, तो जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि क्या 'अपनों' की जांच 'अपने' ही करेंगे? सवाल यह उठता है कि क्या अरविन्द शर्मा अपने ही अधीनस्थ क्षेत्र के अधिकारियों के खिलाफ निष्पक्ष रिपोर्ट देंगे? या फिर यह जांच केवल फाइलें दबाने और लीपापोती करने का एक जरिया बनकर रह जाएगी?

अन्य निकायों का भी यही हाल?

नगर परिषद खांड का यह मामला कोई एकलौती घटना नहीं है। चर्चा है कि शहडोल संभाग सहित प्रदेश के कई अन्य छोटे निकायों में भी इसी तरह का ढर्रा चल रहा है। चहेते सप्लायरों को लाभ पहुँचाने के लिए उपयंत्रियों और तकनीकी अधिकारियों की राय को दरकिनार करना एक परंपरा बनती जा रही है। यदि इस मामले में निष्पक्ष जांच होती है और दोषियों पर कड़ी दंडात्मक कार्यवाही की जाती है, तो अन्य निकायों के लिए यह एक कड़ा संदेश होगा। लेकिन यदि जांच समिति ने केवल कागजी खानापूर्ति की, तो भ्रष्ट अधिकारियों के हौसले और बुलंद होंगे।

नतीजों पर टिकी निगाहें

फिलहाल, संयुक्त संचालक कार्यालय ने 22 अप्रैल को पत्र जारी कर खांड के मुख्य नगरपालिका अधिकारी को निर्देश दिया है कि वे सामग्री क्रय से संबंधित सभी 11 बिंदुओं की मूल फाइलें और बिल-वाउचर 7 दिन के भीतर कार्यालय में जमा कराएं। भ्रष्टाचार के इस मामले में सरकार की साख दांव पर है। अब देखना यह है कि क्या यह जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है या फिर सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना लगाने वाले सफेदपोश अधिकारी सलाखों के पीछे पहुँचते हैं। जनता की निगाहें अब जांच समिति की उस रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो एक सप्ताह के भीतर पेश होनी है।


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