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हरियाणा: भारत–अमेरिका एफटीए पर किसान नेताओं ने उठाए गंभीर सवाल 

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हरियाणा  Published by: Ritesh , Date: 06/02/2026 05:51:10 pm Share:
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  • 06/02/2026 05:51:10 pm
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संक्षेप

हरियाणा: सिरसा एसकेएम गैर-राजनीतिक भारत के कोऑर्डिनेशन कमेटी के सदस्य लखविंदर सिंह औलख ने जानकारी देते हुए बताया कि शुक्रवार की सुबह हरियाणा व पंजाब के किसान आगुओं की जूम मीटिंग हुई जिसमें एफटीए पर चिंता व्यक्त करते हुए किसान आगुओं ने कहा कि भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच व्यापार समझौता गुप्त रूप से बातचीत करके किया गयाए और इसकी शर्तों का खुलासा नहीं किया गया।

विस्तार

हरियाणा: सिरसा एसकेएम गैर-राजनीतिक भारत के कोऑर्डिनेशन कमेटी के सदस्य लखविंदर सिंह औलख ने जानकारी देते हुए बताया कि शुक्रवार की सुबह हरियाणा व पंजाब के किसान आगुओं की जूम मीटिंग हुई जिसमें एफटीए पर चिंता व्यक्त करते हुए किसान आगुओं ने कहा कि भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच व्यापार समझौता गुप्त रूप से बातचीत करके किया गयाए और इसकी शर्तों का खुलासा नहीं किया गया। इसके बजाय केवल अस्पष्ट बयान जारी किए गए, क्योंकि भारतीय पक्ष से जुड़े लोगों को यह समझ थी कि पूरी जानकारी सार्वजनिक करने से देश को राजनीतिक और आर्थिक नुकसान हो सकता है। इतनी दूरगामी आर्थिक और संप्रभुता से जुड़ी शर्तों वाले समझौते में पारदर्शिता की कमी बेहद चिंताजनक है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि पड़ोसी देशों की तुलना में भारत को सबसे अच्छा सौदा मिला है। हालांकि, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर द्वारा समझौते के बारे में दिया गया बयान इस बात का प्रमाण है कि भारत के वाणिज्य मंत्री ने देश को गुमराह किया।

 

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित व्यापार समझौते के अनुसार, भारत अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों जैसे फलों और सब्जियों की एक विस्तृत श्रृंखला पर टैरिफ  को शून्य प्रतिशत तक कम करेगा। इससे स्पष्ट होता है कि भले ही अभी टैरिफ  कम नहीं किए गए हों, लेकिन समझौते में यह समझ बनी हुई है कि इसके प्रावधानों के अनुसार आगे चलकर इन्हें कम किया जाएगा। अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिंस ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर ट्रंप को अमेरिकी किसानों का समर्थन करने के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि यह समझौता अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारत जैसे बड़े बाजार में अधिक निर्यात करने, कीमतें बढ़ाने और ग्रामीण अमेरिका में धन पहुंचाने में मदद करेगा। अमेरिकी कृषि सचिव का यह बयान भी इस बात का प्रमाण है कि भारत ने कृषि वस्तुओं के आयात पर सहमति जताई है। यह विरोधाभास ही दर्शाता है कि वाणिज्य मंत्री के बयान भ्रामक थे और इससे सरकार की जवाबदेही पर सवाल खड़े होते हैं। सबसे बड़ी समस्या इस समझौते में पारदर्शिता की कमी है।

 

 

किसान नेताओं द्वारा वर्ष 2020 में प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र के उत्तर में कहा गया था कि सभी क्षेत्रों के लोगों के साथ चर्चा की जाएगी, लेकिन यह समझा जाता है कि पिछले पांच वर्षों में इस समझौते पर कोई चर्चा, कोई हितधारक परामर्श और कोई अन्य संवाद नहीं हुआ। वे कहते हैं कि समझौते का लाभ यह है कि टैरिफ  50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है, जो पाकिस्तान और बांग्लादेश के 19 प्रतिशत टैरिफ  से भी कम है। इसलिए कहा जा रहा है कि भारत इन देशों की तुलना में कम लागत पर अमेरिकी बाजार में उत्पाद भेज सकेगा। यह गलत जानकारी है। बेहतर होता यदि वाणिज्य मंत्री यह बताते कि जब अन्य देशों की उत्पादन लागत 30 प्रतिशत कम है, तो केवल एक प्रतिशत आयात शुल्क के अंतर से हम उनसे कैसे प्रतिस्पर्धा करेंगे। पाकिस्तान सहित कई देशों ने अमेरिका पर दबाव डाला था कि भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) का दर्जा न दिया जाए लेकिन भारत को एमएफएन का दर्जा नहीं मिला, न ही इसके तहत आयात शुल्क को 10 प्रतिशत तक कम किया गया। इसके अलावा, व्यापार युद्ध से पहले लागू 5-15 प्रतिशत टैरिफ  दरें भी बहाल नहीं की गई। परिणामस्वरूप जब हमारे उत्पादों पर पहले की तुलना में अधिक टैरिफ  लगाए जा रहे हैं, तब भारत अमेरिका से कई वस्तुओं का आयात पहले की दरों से भी कम टैरिफ पर या शून्य शुल्क पर करने की अनुमति दे रहा है। राष्ट्रवादियों को बताना चाहिए कि यह देश के लिए कैसे लाभकारी है।

जिन लोगों ने दावा किया था कि न्यूज़ीलैंड के साथ समझौते में कृषि को शामिल नहीं किया गया, उन्होंने बाद में चुपचाप सेब पर आयात शुल्क 25 प्रतिशत कम कर दिया। इसी प्रकार, आसियान समझौते के तहत तय पाम ऑयल के आयात शुल्क को कई बार कम किया गया। जी-20 की सफलता के नाम पर अमेरिका से सेब, बादाम और अखरोट पर आयात शुल्क चुपचाप घटा दिया गया। जबकि अमेरिका लगातार आयात शुल्क बढ़ाता रहा, भारत ने अक्टूबर 2025 से कपास पर आयात शुल्क समाप्त कर दिया। किसानों के विरोध से बचने के लिए कहा जाता है कि कृषि उत्पाद ऐसे समझौतों का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन बाद में कृषि वस्तुओं पर आयात शुल्क गुप्त रूप से घटा दिए जाते हैं। यह किसानों और देश दोनों के साथ बड़ा विश्वासघात है। औद्योगिक उत्पादों के आयात से घरेलू उद्योगों को नुकसान होने के अलावा, यह कृषि पर भी अप्रत्यक्ष चोट है। औद्योगिक वस्तुओं पर आयात शुल्क घटाने से विकसित देशों को लाभ होता है और इस लाभ से वे अपने कृषि क्षेत्र को भारी सब्सिडी देते हैं। इससे विकसित देशों के कृषि उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कृत्रिम रूप से सस्ते बने रहते हैं।