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मध्य प्रदेश: बैंक पेंशनर्स को अधिकार, विरोधी तत्वों के खिलाफ एकजुट होने का किया आह्वान

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मध्य प्रदेश  Published by: Kamal Patni , Date: 27/01/2026 11:43:48 am Share:
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  • 27/01/2026 11:43:48 am
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संक्षेप

मध्य प्रदेश: बैंक पेंशन योजना 1993–1995 के समय यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि इसका आधार RBI तथा CCG (Central Civil Government) के नियम, परिनियम और पेंशन सिद्धांत हैं। यही कारण है कि इस विषय में सर्वोच्च न्यायालय को भी उन्हीं संवैधानिक व नियामक आधारों पर निर्णय देना आवश्यक है, न कि IBA अथवा कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा गढ़े गए भ्रमकारी तर्कों पर।

विस्तार

मध्य प्रदेश: बैंक पेंशन योजना 1993–1995 के समय यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि इसका आधार RBI तथा CCG (Central Civil Government) के नियम, परिनियम और पेंशन सिद्धांत हैं। यही कारण है कि इस विषय में सर्वोच्च न्यायालय को भी उन्हीं संवैधानिक व नियामक आधारों पर निर्णय देना आवश्यक है, न कि BA अथवा कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा गढ़े गए भ्रमकारी तर्कों पर। आज यह कहना कि रेगुलेशन में प्रोविजन नहीं है। पर्याप्त पेंशन फंड नहीं है। “बैंकों पर आर्थिक भार आ जाएगा”, या “बैंक सक्षम नहीं हैं” ये सभी तर्क कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक और मानसिक दबाव बनाने के हथकंडे हैं। 35/1 और 56 जैसे मुद्दों को जानबूझकर बार-बार उछालना केवल मुद्दे को उलझाने, समय खींचने और न्याय को टालने की साजिश है। हकीकत यह है कि बैंक पेंशन कोई दया नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार और स्थगित वेतन (Deferred Wages) है।

 

जिस व्यवस्था ने बैंकों को रिकॉर्ड मुनाफ़े तक पहुँचाया, उसी व्यवस्था के रचयिताओं—पेंशनर्स—को “आर्थिक बोझ” कहना न केवल अन्याय है, बल्कि नैतिक अपराध भी है। आज आवश्यकता है कि समस्त बैंक पेंशनर्स जागृत हों और अपने ही बीच छिपे उन तत्वों को पहचानें, जो AIBEA, UFBU, CHV, S.C. Jain, J.D. Sharma जैसे चेहरों के पीछे छिपकर पेंशनर्स के हितों के विरुद्ध भूमिका निभा रहे हैं। यही वे लोग हैं जो कभी मुद्दे को द्विपक्षीय वार्ता से बाहर रखते हैं, कभी हड़ताल का विषय नहीं बनने देते और कभी IBA के साथ समझौते कर पेंशनर्स के अधिकारों की सौदेबाज़ी करते हैं। सच्चाई यह भी है कि सरकार पेंशन अपडेशन करना चाहती है, द्विपक्षीय समझौतों की आड़ में चल रही यूनियन-नेतागर्दी को समाप्त कर वेतन आयोग की व्यवस्था लागू करना चाहती है, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो। लेकिन इसमें सबसे बड़ा अवरोध वही तथाकथित नेता हैं, जिनकी सत्ता पेंशनर्स के संघर्ष से नहीं, बल्कि भ्रम और भय से चलती है। इसलिए आज आह्वान है- बैंक पेंशनर्स और सेवारत कर्मचारी सरकार के उस कदम का समर्थन करें जो न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों के पक्ष में हो समय आ गया है कि गद्दारों को उजागर किया जाए, भ्रम को तोड़ा जाए और एकजुट होकर कहा जाए।