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मध्य प्रदेश: पेंशनर्स के साथ दोहरा व्यवहार बैंक यूनियनों पर भेदभाव और उपेक्षा का गंभीर आरोप
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: जब बैंक यूनियनें पेंशन अद्यतन, डीए एरियर, विशेष भत्ते पर पेंशन, समुचित चिकित्सा बीमा और 8088 डीए जैसे बुनियादी मुद्दों पर हड़ताल को “उचित” मानती हैं, तब यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है
विस्तार
मध्य प्रदेश: जब बैंक यूनियनें पेंशन अद्यतन, डीए एरियर, विशेष भत्ते पर पेंशन, समुचित चिकित्सा बीमा और 8088 डीए जैसे बुनियादी मुद्दों पर हड़ताल को “उचित” मानती हैं, तब यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि आखिर इन्हीं मुद्दों पर वर्षों से पीड़ित बैंक पेंशनर्स के साथ AIBEA और UFBU के नेताओं ने ऐसा दोहरा, उपेक्षापूर्ण और भेदभावपूर्ण व्यवहार क्यों किया। पेंशनर्स की बहुप्रतीक्षित मांगों को कभी द्विपक्षीय समझौता वार्ता में वरीयता के आधार पर शामिल ही नहीं किया गया, और जब कभी चर्चा का अवसर आया, तब जानबूझकर उन्हें हाशिये पर ही धकेल दिया गया। IBA के साथ सौदे और पेंशनर्स की कीमत IBA के साथ पेंशनर्स के नाम पर लिए गए निर्णय—चाहे वह मेडिक्लेम पॉलिसी का मामला हो, दूसरा पेंशन विकल्प (Second Pension Option) हो, या अन्य लाभ—हर जगह पेंशनर्स के हितों से समझौता किया गया। मेडिक्लेम के नाम पर भारी प्रीमियम, सीमित कवर और बैंक की जवाबदारी से पल्ला झाड़ने वाली शर्तें थोप दी गईं। सेकंड पेंशन ऑप्शन में पेंशनर्स से आपराधिक प्रकृति की अवैध वसूली कराई गई, जबकि उन्हें विधिसम्मत अधिकार मिलना चाहिए था। सेवानिवृत्ति के दिन से पेंशन—अब भी सपना आज भी हजारों बैंक कर्मचारी ऐसे हैं जिन्हें सेवानिवृत्ति की तिथि से पेंशन नहीं मिलती। यह कोई तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि एक स्थापित प्रशासनिक अन्याय है, जिसे यूनियनें चाहें तो एक दिन में समाप्त करा सकती हैं। लेकिन प्रश्न यह है—क्या उन्होंने कभी इसे प्राथमिकता दी? उत्तर स्पष्ट है: नहीं। अंतिम सवाल यदि यूनियनें आज भी स्वयं को बैंक कर्मियों और पेंशनर्स की प्रतिनिधि मानती हैं, तो उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि पेंशनर्स के साथ यह दोहरा मापदंड क्यों अपनाया गया। और यदि वे जवाब नहीं दे सकतीं, तो इतिहास उन्हें संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में नहीं, बल्कि अधिकारों के सौदागर के रूप में याद रखेगा।पेंशन कोई कृपा नहीं—अधिकार है। और अधिकारों के साथ समझौता करने वालों को कठघरे में खड़ा करना भी अधिकार है।
हड़ताल का हथियार—पर पेंशनर्स के लिए नहीं? यह विडंबना ही नहीं, बल्कि विश्वासघात है कि जिन मुद्दों को आज यूनियनें हड़ताल योग्य मान रही हैं, उन्हीं मुद्दों को पेंशनर्स के संदर्भ में न तो कभी गंभीरता से उठाया गया और न ही किसी आंदोलन का विषय बनाया गया। जब वर्तमान कर्मचारियों के हितों की बात आती है, तब यूनियनें संघर्ष की भाषा बोलती हैं, लेकिन पेंशनर्स के मामले में वही यूनियनें IBA के आगे समर्पण की मुद्रा में दिखाई देती हैं। यह चयनात्मक संघर्ष नहीं, बल्कि खुला भेदभाव है।
CHV मॉडल और बैंक की जवाबदेही से मुक्ति CHV-C H V - C H V A N D
(Common Hospitalization / Health Vendor) के माध्यम सेभी
C H V द्वारा बैंक से पेंशन लेते हुए भी बैंक को पेंशनर्स के प्रति हर प्रकार की जिम्मेदारी से मुक्त कर देने वाला अनुबंध अपने-आप में यूनियन नेतृत्व को कटघरे में खड़ा करता है। यह दर्शाता है कि पेंशनर्स को एक “बोझ” की तरह देखा गया, न कि उन संस्थाओं की रीढ़ के रूप में, जिन्होंने अपना पूरा कार्यजीवन बैंकों को दिया।
अब उच्च स्तरीय जांच अनिवार्य है इन सभी तथ्यों—पेंशन अद्यतन की उपेक्षा, द्विपक्षीय वार्ता से बाहर रखना, हड़तालों में मुद्दा न बनाना, IBA से समझौते, अवैध वसूली, मेडिक्लेम की शर्तें और CHV जैसे अनुबंध—पर एक स्वतंत्र, उच्च स्तरीय और समयबद्ध जांच अब टालने योग्य नहीं है। यह केवल पेंशनर्स का प्रश्न नहीं, बल्कि यूनियन लोकतंत्र और जवाबदेही का भी प्रश्न है।
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