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मध्य प्रदेश: संविधान में समानता का मतलब योग्यता की उपेक्षा नहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: भारत का संविधान समानता, न्याय और गरिमा की नींव पर खड़ा है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: भारत का संविधान समानता, न्याय और गरिमा की नींव पर खड़ा है। अनुच्छेद 14 प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण प्रदान करता है। परंतु आज यह प्रश्न गंभीर रूप से खड़ा हो गया है कि — क्या समानता के नाम पर ऐसे निर्णय लिए जा रहे हैं, जो वास्तव में नई असमानता पैदा कर रहे हैं। समानता बनाम समानता का भ्रम समानता का अर्थ यह कभी नहीं रहा कि सभी को एक ही स्तर पर जबरन खड़ा कर दिया जाए। संविधान निर्माताओं ने स्पष्ट रूप से माना था कि समाज में ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ रही हैं, इसलिए कुछ वर्गों को सहायता (affirmative action) की आवश्यकता हो सकती है। परंतु सहायता और बराबरी थोपने के बीच एक महीन लेकिन निर्णायक रेखा होती है। पहले से समान अवसरों पर खड़े विद्यार्थी या मेहनत, योग्यता और प्रतिस्पर्धा से आगे बढ़े वर्ग नीतिगत फैसलों से पीछे धकेले जा रहे हैं।
तो यह समानता नहीं, बल्कि “Reverse Discrimination” है। संविधान क्या कहता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 14 का उद्देश्य मनमानी रोकना है, न कि योग्यता को दंडित करना। Reasonable Classification तभी वैध है, जब उसका उद्देश्य तार्किक हो और उपाय संतुलित हों Indra Sawhney, M. Nagaraj, और हालिया EWS से जुड़े निर्णयों में न्यायालय ने दो टूक कहा है कि
सामाजिक न्याय का अर्थ यह नहीं कि मेरिट को समाप्त कर दिया जाए। यदि कोई नीति समान स्थिति वाले लोगों के साथ अलग-अलग व्यवहार करती है और इसका कोई ठोस, वस्तुनिष्ठ आधार नहीं है। तो वह संवैधानिक कसौटी पर असफल मानी जाएगी।
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