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मध्य प्रदेश: सुप्रीम कोर्ट सच बोलना अपराध नहीं, FIR डराने का हथियार नहीं
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: सुप्रीम कोर्ट का लोकतांत्रिक संदेश हाल के समय में यह एक खतरनाक प्रवृत्ति बनती जा रही है कि जो व्यक्ति या पत्रकार सच लिखता है, सवाल करता है या व्यवस्था की गड़बड़ियों को उजागर करता है,
विस्तार
मध्य प्रदेश: सुप्रीम कोर्ट का लोकतांत्रिक संदेश हाल के समय में यह एक खतरनाक प्रवृत्ति बनती जा रही है कि जो व्यक्ति या पत्रकार सच लिखता है, सवाल करता है या व्यवस्था की गड़बड़ियों को उजागर करता है, उसके विरुद्ध FIR दर्ज कर दी जाती है। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट द्वारा Writ Petition (Cr.) No. 402/2024 में दिया गया संदेश लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि FIR का उपयोग सच को दबाने या डराने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता। आज आवश्यकता है कि जनता जागरूक बने। यदि आज पत्रकार चुप करा दिए गए, तो कल आम नागरिक की आवाज भी दबा दी जाएगी। इसलिए समाज का कर्तव्य है कि वह सच्चे पत्रकारों के साथ खड़ा हो, फर्जी मामलों का विरोध करे और सच बोलने वालों की सुरक्षा की मांग करे। इतिहास गवाह है जिस देश में पत्रकार डर जाते हैं, वहाँ जनता गुलाम बन जाती है। सुप्रीम कोर्ट के इस संदेश ने यह साबित किया है कि अभी भी सच जिंदा है, और लोकतंत्र की सांसें चल रही हैं। अब सवाल जनता से है क्या हम सच के साथ खड़े होंगे, या चुप रहकर अन्याय को मजबूत करेंगे।
यह फैसला केवल किसी एक पत्रकार की राहत नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा का प्रतीक है। पत्रकार ने जब सिस्टम की खामियों को उजागर किया, तो उसके जवाब में सत्ता या व्यवस्था ने उस पर झूठा मामला लादने की कोशिश की। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी मानसिकता को लोकतंत्र के लिए घातक माना और स्पष्ट शब्दों में कहा कि सच लिखना अपराध नहीं है।
भारतीय लोकतंत्र चार मजबूत स्तंभों पर टिका है— विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और चौथा स्तंभ: मीडिया / पत्रकार। यदि चौथा स्तंभ कमजोर किया गया, डराया गया या चुप करा दिया गया, तो शेष तीनों स्तंभ निरंकुश हो जाते हैं। पत्रकार ही वह कड़ी है जो जनता और सत्ता के बीच सेतु का काम करता है। आज की सच्चाई यह है कि— जो सच बोले, उस पर केस हो जाता है। जो सवाल करे, उसे धमकाया जाता है।
जो घोटाला उजागर करे, उसे बदनाम किया जाता है। यह स्थिति लोकतंत्र की नहीं, बल्कि तानाशाही की ओर बढ़ते कदमों की पहचान है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने संदेश में यह साफ कर दिया है कि FIR डर पैदा करने का औजार नहीं हो सकती, और न ही अभिव्यक्ति की आज़ादी को अपराध की तरह देखा जा सकता है। यह फैसला केवल पत्रकारों के लिए नहीं, बल्कि हर उस नागरिक के लिए है जो सवाल पूछने का साहस रखता है।
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