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मध्य प्रदेश: UGC के भेदभाव-रोधी नियम बहस ज़रूरी, लेकिन पूरा सिस्टम क्यों नहीं?
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: हाल ही में UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए कुछ नए नियम/दिशानिर्देश जारी किए। उद्देश्य स्पष्ट है छात्रों और शिक्षकों के साथ जाति, वर्ग, क्षेत्र, भाषा या किसी भी आधार पर अन्याय न हो।
विस्तार
मध्य प्रदेश: हाल ही में UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए कुछ नए नियम/दिशानिर्देश जारी किए। उद्देश्य स्पष्ट है छात्रों और शिक्षकों के साथ जाति, वर्ग, क्षेत्र, भाषा या किसी भी आधार पर अन्याय न हो।
लेकिन जैसे ही ये नियम आए, विरोध भी शुरू हो गया। कहा गया— इससे संस्थानों पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा यह “ओवर-रेगुलेशन” है इससे स्वायत्तता प्रभावित होगी
सवाल यह नहीं कि नियम सही हैं या गलत— सवाल यह है कि बहस सिर्फ UGC तकही क्यों सीमित है?अगर भेदभाव गलत है, तो हर जगह गलत है शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकना ज़रूरी है लेकिन क्या शासन और प्रशासन भेदभाव-मुक्त हैं?
सच यह है कि भवन अनुमति में एक को महीनों दौड़ाया जाता है, दूसरे को मौखिक इशारे पर मंजूर जमीन के रिकॉर्ड में एक की फाइल दबा दी जाती है, दूसरे की रातों-रात दुरुस्त शिकायत करने वाले को “परेशान करने वाला” और चुप रहने वाले को सहयोगी नागरिक” माना जाता हबुजुर्ग, कमजोर और साधनहीन व्यक्ति को सिस्टम थका देता है।
यह भेदभाव कागज़ पर नहीं, व्यवहार में होता है और सबसे ज्यादा पीड़ा यहीं है।
UGC में नियम, लेकिन कलेक्टर ऑफिस में कौन सा नियम? UGC कहता है— Grievance Redressal Cell हो जवाबदेही तय हो समयसीमा हो लेकिन सवाल उठता है क्या कलेक्टर कार्यालय, नगर निगम, तहसील में भेदभाव-रोधी सेल है?
क्या अफसर के मौखिक आदेश से किसी नागरिक का अधिकार रोका जा सकता है?
क्या बिना लिखित आदेश के काम लटकाना भेदभाव नहीं है? अगर शिक्षक या प्रोफेसर के खिलाफ नियम बन सकते हैं, तो पटवारी, तहसीलदार, इंजीनियर, आयुक्त के लिए क्यों नहीं? विरोध नियमों का नहीं, जवाबदेही का है UGC के नियमों का विरोध दरअसल भेदभाव खत्म होने के डर से नहीं, जवाबदेही आने के डर से है।
क्योंकि जब लिखित जवाब देना पड़े निर्णय का कारण बताना पड़े देरी का हिसाब देना पड़े तो “मनमानी” खत्म हो जाती है। यही कारण है कि ऐसे नियम सिर्फ विश्वविद्यालयों तक सीमित रखे जाते हैं शासन-प्रशासन तक नहीं पहुँचने दिए जाते। तो समाधान क्या है।
अगर सरकार सच में भेदभाव रोकना चाहती है, तो— हर प्रशासनिक कार्यालय में भेदभाव-निरोधक एवं शिकायत निवारण तंत्र बने बिना लिखित आदेश किसी नागरिक के अधिकार रोकने पर दंडात्मक प्रावधान हो समयसीमा उल्लंघन को कदाचार (Misconduct) माना जाए कमजोर वर्ग, बुजुर्ग और महिलाओं के मामलों में प्राथमिकता अनिवार्य हो UGC के नए नियमों पर चर्चा जरूरी है,
लेकिन उससे भी जरूरी है यह पूछना— जो भेदभाव किताबों से नहीं, फाइलों से होता है उसे रोकने के लिए शासन क्या कर रहा है? जब तक नियम सिर्फ शिक्षा संस्थानों तक सीमित रहेंगे, और सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँचेंगे तब तक भेदभाव का अंत नहीं, केवल उसका स्थानांतरण होता रहेगा। अब समय आ गया है कि सवाल बदला जाए UGC क्यों? नहीं।
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