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मध्य प्रदेश: अवैध कब्जे को “सिविल विवाद” बताकर प्रशासन हुआ निष्क्रिय
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि वहाँ कानून का शासन होता है और नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
विस्तार
मध्य प्रदेश: किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि वहाँ कानून का शासन होता है और नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं। पुलिस प्रशासन, राजस्व विभाग और स्थानीय प्रशासन को इसी उद्देश्य से अधिकार दिए गए हैं कि वे नागरिकों की संपत्ति और अधिकारों की रक्षा करें, लेकिन जब यही संस्थाएँ अपने कर्तव्य का पालन करने के बजाय निष्क्रिय हो जाएँ या अप्रत्यक्ष रूप से अपराधियों को संरक्षण देने लगें, तब यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक बन जाती है। आज कई स्थानों पर यह देखने में आ रहा है कि किसी भूमि का वैध विक्रय विलेख (रजिस्ट्री), कब्जा हस्तांतरण और नामांतरण आदेश होने के बावजूद वास्तविक भूमि स्वामी को उसका अधिकार प्राप्त नहीं हो पा रहा है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति छल, बल या प्रभाव के आधार पर भूमि पर कब्जा कर लेता है तो पुलिस प्रशासन अक्सर इसे “भूमि विवाद” या “सिविल विवाद” बताकर कार्यवाही से बचने का प्रयास करता है। यह तर्क न केवल कानून की भावना के विरुद्ध है बल्कि न्याय के मूल सिद्धांतों को भी कमजोर करता है। वास्तव में भूमि का स्वामित्व और उसका वैध दस्तावेजी अधिकार एक अलग विषय है, जबकि किसी व्यक्ति द्वारा अवैध कब्जा करना, अतिक्रमण करना या बलपूर्वक किसी की संपत्ति पर अधिकार जमाना एक आपराधिक कृत्य है। ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत कई धाराएँ लागू हो सकती हैं, जैसे आपराधिक अतिक्रमण, धोखाधड़ी, कूटरचना और आपराधिक विश्वासघात। सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि जब कोई व्यक्ति शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा करता है, तब जिला प्रशासन, नगर निगम और पुलिस प्रशासन तुरंत सक्रिय हो जाते हैं और कब्जा हटाने की कार्यवाही करते हैं। उस समय यह मामला “सिविल विवाद” नहीं माना जाता। लेकिन जब वही स्थिति किसी निजी नागरिक के साथ होती है, तब प्रशासन उसे न्यायालय जाने की सलाह देकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करता है। यह दोहरा मापदंड न केवल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़े करता है बल्कि आम नागरिक के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास भी पैदा करता है। रतलाम सहित कई स्थानों पर ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहाँ वैध रजिस्ट्री और दस्तावेज़ होने के बावजूद नामांतरण लंबित रखा गया। आपत्तियों को बहाना बनाकर राजस्व अभिलेखों में संशोधन नहीं किया गया। पुलिस ने स्पष्ट अवैध कब्जे को भी “सिविल विवाद” बताकर एफआईआर दर्ज करने से इंकार कर दिया। यदि कानून लागू करने वाली संस्थाएँ ही अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाएँ, तो अपराधियों का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जहाँ वास्तविक स्वामी अपने अधिकार से वंचित हो जाए और प्रभावशाली या अवैध तत्व भूमि पर कब्जा जमाकर बैठे रहें। लोकतांत्रिक शासन में यह अत्यंत आवश्यक है कि प्रशासन यह स्पष्ट करे कि सिर्फ आपत्ति होना नामांतरण रोकने का वैध आधार नहीं है, जब तक सक्षम न्यायालय द्वारा स्टे आदेश या रजिस्ट्री निरस्त करने का आदेश न दिया जाए, तब तक वैध दस्तावेज़ों के आधार पर कार्यवाही की जानी चाहिए। और यदि कोई व्यक्ति बलपूर्वक कब्जा करता है तो उसे “सिविल विवाद” कहकर टालने के बजाय दंडनीय अपराध मानकर तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए। यदि प्रशासन और पुलिस अपनी जिम्मेदारी से विमुख होते हैं तो यह केवल एक व्यक्ति के अधिकारों का हनन नहीं बल्कि कानून व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी आघात है।
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