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मध्य प्रदेश: 1956-57 के रिकॉर्ड का ‘जिन्न’, विक्रय के बाद नामांतरण रोकना आखिर क्यों?
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: रतलाम शहर में इन दिनों भूमि और भवन संबंधी मामलों में एक अजीब स्थिति देखने को मिल रही है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: रतलाम शहर में इन दिनों भूमि और भवन संबंधी मामलों में एक अजीब स्थिति देखने को मिल रही है। दशकों से खरीद-फरोख्त, रजिस्ट्री, नामांतरण, भवन निर्माण अनुमति और कर भुगतान की प्रक्रियाओं से गुजर चुकी संपत्तियों के मामलों में अचानक 1956-57 के रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रशासन ने वर्तमान समस्याओं का समाधान खोजने के बजाय 70 वर्ष पुराने अभिलेखों का "जिन्न" बोतल से बाहर निकाल दिया हो। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि किसी भूमि का स्वामित्व संदेहास्पद है या भविष्य में नामांतरण नहीं हो सकता, तो क्या भूमि मालिक को संपत्ति बेचने से पहले इसका स्पष्ट प्रमाण-पत्र नहीं मिलना चाहिए? आज स्थिति यह है कि व्यक्ति अपनी भूमि की रजिस्ट्री कर देता है, खरीदार लाखों रुपये का भुगतान कर देता है, स्टाम्प शुल्क जमा हो जाता है, शासन को राजस्व मिल जाता है, लेकिन बाद में नामांतरण के समय यह कहा जाता है कि भूमि का रिकॉर्ड संदिग्ध है या पुराने अभिलेखों के कारण नामांतरण नहीं हो सकता। इससे सबसे अधिक नुकसान आम नागरिक को उठाना पड़ता है। यदि प्रशासन को वास्तव में कानून का पालन कराना है, तो सबसे पहले यह व्यवस्था लागू करनी चाहिए कि कोई भी भूमि मालिक संपत्ति बेचने से पूर्व सक्षम राजस्व प्राधिकारी से एक "विक्रय एवं नामांतरण पात्रता प्रमाण-पत्र" प्राप्त करे। इस प्रमाण-पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख हो कि भूमि का स्वामित्व अभिलेखों में स्पष्ट है।
भूमि किसी विवाद, प्रतिबंध या न्यायालयीन आदेश के अधीन नहीं है। विक्रय के बाद नामांतरण किए जाने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। भविष्य में नामांतरण अस्वीकार होने की संभावना नहीं है। यदि ऐसा प्रमाण-पत्र उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो फिर विक्रय के बाद नामांतरण रोकना न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला कदम भी माना जाएगा। क्योंकि जहां अनिश्चितता होगी, वहां दलालों, बिचौलियों और भ्रष्ट तंत्र के लिए अवसर स्वतः पैदा होंगे। यह भी विचारणीय है कि यदि शासन के पास 1956-57 से संबंधित कोई आपत्ति थी, तो वह पिछले 70 वर्षों में क्यों नहीं उठाई गई? रजिस्ट्री हुई, नामांतरण हुए, कर वसूले गए, भवन निर्माण अनुमतियां दी गईं और नागरिकों को मालिक माना गया। फिर अचानक पुराने रिकॉर्ड के आधार पर नामांतरण रोकना प्रशासनिक विफलता का प्रमाण माना जाएगा, न कि नागरिक की गलती। रतलाम की जनता यह जानना चाहती है कि क्या शासन का उद्देश्य अवैध विक्रय रोकना है या फिर नामांतरण को जटिल बनाकर भ्रष्टाचार के नए रास्ते खोलना? यदि अवैध विक्रय रोकना ही लक्ष्य है, तो समाधान स्पष्ट है— पहले पात्रता प्रमाण-पत्र जारी करें, फिर विक्रय होने दें। लेकिन यदि विक्रय के बाद नामांतरण पर तलवार लटकती रहेगी, तो इसका खामियाजा केवल आम नागरिक भुगतेगा, जबकि वास्तविक दोषी तंत्र की जवाबदेही तय नहीं होगी। आज आवश्यकता 1956-57 के जिन्न को बार-बार बाहर निकालने की नहीं, बल्कि ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनाने की है जिसमें नागरिक को पहले ही पता हो कि उसकी भूमि का विक्रय और नामांतरण विधिसम्मत रूप से संभव है या नहीं। यही सुशासन है, यही पारदर्शिता है और यही भ्रष्टाचार पर वास्तविक प्रहार भी है।
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