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मध्य प्रदेश: भवन अनुमति में देरी से बढ़ी परेशानी, नगर निगम की जवाबदेही पर उठे सवाल

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मध्य प्रदेश  Published by: Kamal Patni , Date: 07/09/2026 01:50:51 pm Share:
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  • 07/09/2026 01:50:51 pm
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संक्षेप

मध्य प्रदेश: नागरिक जब कोई भवन निर्माण करना चाहता है तो उससे कहा जाता है कि पहले निर्धारित प्रक्रिया पूरी करो, अनुमति प्राप्त करो और उसके बाद ही निर्माण करो।

विस्तार

मध्य प्रदेश: नागरिक जब कोई भवन निर्माण करना चाहता है तो उससे कहा जाता है कि पहले निर्धारित प्रक्रिया पूरी करो, अनुमति प्राप्त करो और उसके बाद ही निर्माण करो। यह पूरी तरह उचित है। कानून का पालन करना नागरिक की जिम्मेदारी है। लेकिन इसके साथ एक समान रूप से महत्वपूर्ण प्रश्न भी है, जब नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह अनुमति प्राप्त किए बिना निर्माण न करे, तो संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी क्यों नहीं है कि वह नागरिक के आवेदन पर कानून के अनुसार समय पर अनुमति दे अथवा स्पष्ट कारणों के साथ निर्णय करे? नागरिक को अनुमति लेने के लिए बाध्य किया जाता है, लेकिन यदि वही अनुमति महीनों अथवा वर्षों तक लंबित रख दी जाए तो नागरिक क्या करे? क्या वह अनिश्चितकाल तक अधिकारी के कार्यालय के चक्कर लगाता रहे? क्या उसे अपने वैधानिक अधिकार के लिए न्यायालय की शरण लेने और वर्षों तक समय एवं धन खर्च करने के लिए मजबूर किया जाना प्रशासनिक व्यवस्था का उद्देश्य है। 

नगर निगम के अधिकारियों को कानून और नियमों के आधार पर निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है। फिर प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय के लिए कानूनी सलाह का सहारा लेकर निर्णय लेने से बचने की प्रवृत्ति क्यों दिखाई देती है? कानूनी सलाह वहाँ उपयोगी और आवश्यक है जहाँ वास्तव में कोई जटिल कानूनी प्रश्न हो, लेकिन यदि अधिकारी अपने नियमित प्रशासनिक दायित्वों का निर्णय भी स्वयं लेने के बजाय लगातार विधिक राय के पीछे छिपाने लगें, तो यह निर्णय क्षमता और प्रशासनिक जवाबदेही, दोनों पर प्रश्न खड़ा करता है। इसका आर्थिक बोझ किस पर पड़ता है? जनता पर। जिस निर्णय को नगर निगम का सक्षम अधिकारी उपलब्ध रिकॉर्ड, नियम और कानून के आधार पर स्वयं ले सकता था, उसके लिए बार-बार कानूनी सलाह ली जाती है तो उस पर होने वाला खर्च भी सार्वजनिक धन से होता है। इसलिए यह जानना आवश्यक है कि कितने मामलों में कानूनी राय ली गई, क्यों ली गई, उस पर कितना खर्च हुआ और क्या वह राय वास्तव में आवश्यक थी।


इससे भी बड़ा प्रश्न तब पैदा होता है जब अधिकारी निर्णय नहीं लेते और नागरिक को न्यायालय जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। नागरिक पहले आवेदन देता है, दस्तावेज प्रस्तुत करता है, निर्धारित शुल्क देता है, कार्यालय के चक्कर लगाता है और फिर भी यदि प्रशासन निर्णय नहीं करता तो अंततः उसे न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है। इस प्रक्रिया में नागरिक का पैसा और समय खर्च होता है तथा न्यायपालिका पर भी ऐसे विवादों का अतिरिक्त बोझ पड़ता है, जिन्हें समय पर प्रशासनिक स्तर पर ही निपटाया जा सकता था। क्या प्रशासनिक अधिकारी का दायित्व केवल यह देखना है कि नागरिक ने नियमों का पालन किया या नहीं? क्या यह देखना अधिकारी का दायित्व नहीं है कि प्रशासन स्वयं भी निर्धारित प्रक्रिया और समय-सीमा का पालन कर रहा है या नहीं। 


यदि नागरिक बिना अनुमति निर्माण करता है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है। लेकिन यदि नागरिक ने विधिवत अनुमति के लिए आवेदन किया और अधिकारी ने समय पर निर्णय नहीं लिया, तो उस प्रशासनिक विलंब की जवाबदेही किसकी होगी? नागरिक को दंडित करने की व्यवस्था तो स्पष्ट दिखाई देती है, लेकिन अधिकारी के विलंब या निर्णय न लेने की जवाबदेही उतनी ही स्पष्ट क्यों नहीं दिखाई देती। यही समानता और सुशासन का वास्तविक प्रश्न है। कानून नागरिक को जिम्मेदारी देता है तो प्रशासन को भी जिम्मेदारी देता है। नागरिक से अपेक्षा की जाती है कि वह कानून का पालन करे; अधिकारी से अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह कानून के अनुसार समय पर निर्णय भी करे।

 


प्रशासनिक अधिकारी यदि हर निर्णय को न्यायालय या कानूनी सलाह के भरोसे छोड़ देंगे, तो फिर उनके पद, अधिकार और निर्णय लेने की जिम्मेदारी का अर्थ क्या रह जाएगा? जनता ने अधिकारियों को निर्णय लेने का अधिकार दिया है, निर्णय से बचने का अधिकार नहीं। नगर निगम का उद्देश्य नागरिक को न्यायालय तक पहुँचने के लिए मजबूर करना नहीं, बल्कि कानून के अनुसार उसके आवेदन का समयबद्ध और निष्पक्ष निपटारा करना होना चाहिए। न्यायालय नागरिक का अधिकार है, लेकिन उसे प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण न्यायालय जाने के लिए मजबूर करना सुशासन नहीं कहा जा सकता। इसलिए अब सवाल केवल किसी एक भवन अनुमति या एक फाइल का नहीं है। सवाल यह है कि क्या नगर निगम में निर्णय लेने की जिम्मेदारी निभाई जा रही है, या कानूनी सलाह, फाइलों और प्रक्रियाओं के पीछे निर्णय लेने से बचने की प्रवृत्ति विकसित हो गई है। यदि ऐसा है तो इसकी समीक्षा केवल नागरिक के आवेदन की नहीं, बल्कि अधिकारी की निर्णय क्षमता, समयबद्धता, जवाबदेही और सार्वजनिक धन के उपयोग की भी होनी चाहिए।