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मध्य प्रदेश: पांच गांव से लेकर पांच फीट जमीन तक, नहीं बदला महाभारत का सबक
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: महाभारत केवल एक युद्ध की कथा नहीं है, बल्कि मानव स्वभाव, लोभ, अहंकार, मोह और रिश्तों के टूटने की सबसे बड़ी सीख भी है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: महाभारत केवल एक युद्ध की कथा नहीं है, बल्कि मानव स्वभाव, लोभ, अहंकार, मोह और रिश्तों के टूटने की सबसे बड़ी सीख भी है। कुरुक्षेत्र का युद्ध किसी बाहरी शत्रु के विरुद्ध नहीं लड़ा गया था, बल्कि एक ही परिवार के भाइयों, गुरुओं, शिष्यों और रिश्तेदारों के बीच लड़ा गया था। इसके मूल में राज्य, संपत्ति और सत्ता का मोह था। आज हजारों वर्ष बाद भी परिस्थितियां बदली नहीं हैं। केवल हस्तिनापुर की जगह शहरों और गांवों ने ले ली है, राजसिंहासन की जगह जमीन-जायदाद और बैंक बैलेंस ने ले ली है, लेकिन संघर्ष वही है। आज पैसों और संपत्ति के लिए भाई-भाई के बीच मुकदमे चल रहे हैं। माता-पिता जीवित रहते हुए भी बेटे संपत्ति के बंटवारे की चिंता में लगे रहते हैं। बहन-बेटियों को उनका अधिकार देने में आनाकानी की जाती है। वर्षों पुराने प्रेम और विश्वास के रिश्ते कुछ लाख रुपये या कुछ फीट जमीन के लिए टूट जाते हैं। महाभारत में दुर्योधन ने केवल पांच गांव देने से इंकार कर दिया था। परिणाम यह हुआ कि पूरा वंश नष्ट हो गया। आज भी कई परिवार कुछ फीट जमीन, एक मकान या व्यापार के हिस्से के लिए अदालतों के चक्कर काटते हुए पीढ़ियां बर्बाद कर देते हैं। मुकदमे चलते रहते हैं और रिश्ते समाप्त हो जाते हैं।
विडंबना यह है कि जिस संपत्ति के लिए संघर्ष किया जाता है, उसका वास्तविक सुख भी प्रायः किसी को नहीं मिल पाता। अदालतों में समय, धन और मानसिक शांति समाप्त हो जाती है। माता-पिता का सम्मान खो जाता है, भाई एक-दूसरे का चेहरा तक देखना पसंद नहीं करते और अगली पीढ़ी विरासत में केवल विवाद प्राप्त करती है। महाभारत के युद्ध के बाद युधिष्ठिर की पीड़ा इसी सत्य को उजागर करती है। विजय मिलने के बाद भी वे प्रसन्न नहीं थे, क्योंकि अपनों की कीमत पर मिली सफलता उन्हें शांति नहीं दे सकी। आज भी यही स्थिति दिखाई देती है। व्यक्ति धन तो कमा लेता है, लेकिन परिवार खो देता है; बड़ा मकान बना लेता है, लेकिन उसमें अपनापन नहीं बचता; बैंक बैलेंस बढ़ जाता है, लेकिन रिश्तों का खाता खाली हो जाता है। समाज में एक और चिंताजनक प्रवृत्ति बढ़ रही है। पैसा व्यक्ति के मूल्यांकन का आधार बन गया है। रिश्तों की मजबूती अब प्रेम, विश्वास और संस्कारों से नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति से मापी जाने लगी है। जिसके पास धन है, उसका सम्मान है; जिसके पास नहीं है, वह उपेक्षित हो जाता है। यह प्रवृत्ति सामाजिक और नैतिक दोनों दृष्टियों से खतरनाक है।
महाभारत हमें सिखाती है कि लोभ की कोई सीमा नहीं होती। जो व्यक्ति केवल संपत्ति के पीछे भागता है, वह अंततः अपने सबसे मूल्यवान धन—अपने रिश्तों—को खो देता है। धन जीवन की आवश्यकता है, लेकिन जब वह जीवन का उद्देश्य बन जाता है, तब विनाश का कारण भी बन सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवारों में संवाद बढ़े, संपत्ति से अधिक संबंधों को महत्व दिया जाए और विवादों का समाधान न्यायपूर्ण तथा सौहार्दपूर्ण तरीके से किया जाए। आखिरकार मनुष्य अपने साथ न धन ले जाता है, न संपत्ति। पीछे यदि कुछ रह जाता है तो उसका व्यवहार, उसका चरित्र और उसके द्वारा बनाए गए रिश्ते। महाभारत का सबसे बड़ा संदेश यही है कि संपत्ति की रक्षा करते-करते यदि रिश्ते नष्ट हो जाएं, तो वह लाभ नहीं, सबसे बड़ी हानि है। धन फिर से कमाया जा सकता है, लेकिन टूटे हुए विश्वास और बिखरे हुए परिवार को जोड़ना अत्यंत कठिन होता है। कुरुक्षेत्र आज भी मौजूद है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब युद्ध तलवारों से नहीं, बल्कि लालच, अहंकार, मुकदमों और स्वार्थ से लड़े जा रहे हैं। प्रश्न यह है कि हम दुर्योधन का मार्ग चुनेंगे या धर्म, न्याय और पारिवारिक सद्भाव का।
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