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राजस्थान: 16 मई को दुर्लभ संयोग में मनाई जाएगी शनि जयंती, विशेष पूजा का होगा महत्व

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राजस्थान  Published by: Shahihurehman , Date: 11/05/2026 05:44:01 pm Share:
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संक्षेप

राजस्थान: टोक न्यायाधिपति शनिदेव  की जयन्ति ,प्रति वर्ष जयेष्ठ मास की अमावस्या को मनाई जाती हैं  जो इस वर्ष 16 मई शनिवार को विशेष महासयोग मे मनाई जायेगी इस के पहले 2016 मे शनिवार को शनि जयन्ति मनाई गई थी मनु ज्योतिष एवं वास्तु शोध सस्थान टोक के निदेशक बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि  इस दिन अमावस्या तिथि सुबह 05.11 बजे से अर्द्ध रात्रि बाद 01.34 बजे तक रहेगी भरणी नक्षत्र दोपह बाद 05.30 बजे तक उपरांत कृतिका नक्षत्र मेष का चंद्रमा रात्रि 10.46 बजे तक उपरांत वृष का शुरू होगा, सोभाग्य योग सुबह 10.25 बजे तक उपरान्त सोभन योग का संयोग  रहेगा जो विशेष फलदायी योग बना  रहा है, इस दिन सोभाग्य योग का दुर्लभ सयोग  बनने से साढै साती, ढैया, एव शनि महादशा से  पिडित जातको लोगों के लिये विशेष शुभ एवं सिद्धि मुहूर्त  है, इस दिन वट आमावस्या का संयोग होने से सुहागिन महिलाएं अखंड सोभाग्य की कामना के साथ वट सावित्री पूजन भी करेगी ।

विस्तार

राजस्थान: टोक न्यायाधिपति शनिदेव  की जयन्ति ,प्रति वर्ष जयेष्ठ मास की अमावस्या को मनाई जाती हैं  जो इस वर्ष 16 मई शनिवार को विशेष महासयोग मे मनाई जायेगी इस के पहले 2016 मे शनिवार को शनि जयन्ति मनाई गई थी मनु ज्योतिष एवं वास्तु शोध सस्थान टोक के निदेशक बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि  इस दिन अमावस्या तिथि सुबह 05.11 बजे से अर्द्ध रात्रि बाद 01.34 बजे तक रहेगी भरणी नक्षत्र दोपह बाद 05.30 बजे तक उपरांत कृतिका नक्षत्र मेष का चंद्रमा रात्रि 10.46 बजे तक उपरांत वृष का शुरू होगा, सोभाग्य योग सुबह 10.25 बजे तक उपरान्त सोभन योग का संयोग  रहेगा जो विशेष फलदायी योग बना  रहा है, इस दिन सोभाग्य योग का दुर्लभ सयोग  बनने से साढै साती, ढैया, एव शनि महादशा से  पिडित जातको लोगों के लिये विशेष शुभ एवं सिद्धि मुहूर्त  है, इस दिन वट आमावस्या का संयोग होने से सुहागिन महिलाएं अखंड सोभाग्य की कामना के साथ वट सावित्री पूजन भी करेगी । बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि इस दिन शनिदेव को शनि मंदिर जाकर सरसों का तेल अर्पित करते हैं। यह परंपरा विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है, जिसके पीछे कई पौराणिक और वैज्ञानिक कारण हैं। हिन्दू धर्म में शनिदेव को शनिश्चर का देवता माना जाता है, और उन्हें सांटनिश्चर भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'सज्जनों का नेता'। शनिवार को उनकी पूजा करने से भक्तों को विशेष लाभ मिलता है। इस दिन उनकी पूजा से भक्तों को शुभाशीष प्राप्त होता है। शनिदेव को नीले वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनका वाहन काला घोड़ा है।

 

हनुमान जी और शनिदेव की एक प्राचीन कथा के अनुसार, रावण के पुत्र मेघनाथ ने शनिदेव को युद्ध में पराजित कर घायल कर दिया था। तब हनुमान जी ने उनके शरीर पर सरसों का तेल लगाया, जिससे उन्हें आराम मिला और वे जल्दी ठीक हो गए। तभी से शनिदेव को सरसों का तेल प्रिय माना जाने लगा। शनिदेव का रंग काला है, और सरसों का तेल भी काले रंग का होता है, इसलिए उन्हें यह अर्पित किया जाता है। सरसों के तेल में कई औषधीय गुण होते हैं। यह रक्त संचार को सुधारता है, जोड़ों के दर्द से राहत देता है, और त्वचा के लिए फायदेमंद होता है। शनिदेव को 'न्याय के देवता' के रूप में जाना जाता है। माना जाता है कि सरसों का तेल चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं। शनिदेव को सरसों का तेल कैसे चढ़ाएं बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि शनिवार को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। एक दीपक में सरसों का तेल भरकर जलाएं और उसे शनिदेव की प्रतिमा के सामने रखें। ओम शनिदेवाय नम  मंत्र का जाप करते हुए सरसों का तेल अर्पित करें। शनिदेव को नीले फूल, काले कपड़े, काले तिल और उड़द की दाल भी अर्पित करें। उनकी आरती गाएं और अपनी मनोकामना व्यक्त करें। शनिदेव पर शनिवार को तेल चढ़ाने से उनकी मूर्ति चमकदार रहती है। सरसों का तेल जलाने से वातावरण शुद्ध होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। पौराणिक और वैज्ञानिक दोनों कारणों से शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाना महत्वपूर्ण है, जिससे भक्तों को कष्टों से मुक्ति मिलती है।