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राजस्थान: टोंक में आज भी कायम है नवाबी दौर की महफिल-ए-मिलाद की ऐतिहासिक परंपरा

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राजस्थान  Published by: Shahihurehman , Date: 25/08/2026 03:39:15 pm Share:
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संक्षेप

राजस्थान: टोंक में नवाबी रियासत के दौर से चली आ रही ऐतिहासिक महफिल-ए-मिलाद की परंपरा आज भी जारी है।

विस्तार

राजस्थान: टोंक में नवाबी रियासत के दौर से चली आ रही ऐतिहासिक महफिल-ए-मिलाद की परंपरा आज भी जारी है। हजरत मुहम्मद साहब के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में नजर बाग पैलेस में रविवार से साप्ताहिक महफिल-ए-मिलाद का आयोजन शुरू होगा। बताया गया कि जौहर की नमाज के बाद शुरू होने वाला यह आयोजन यौमे पैदाइश के बाद तक चलेगा। इस दौरान विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। यह परंपरा टोंक रियासत के चौथे नवाब इब्राहिम अली खां के शासनकाल में शुरू हुई थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुस्तकों के अनुसार, नवाब इब्राहिम अली खां ने लंबे समय तक इस महफिल का आयोजन कराया। उनके शासनकाल के बाद भी उनके वंशजों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और आज तक इसका आयोजन किया जा रहा है। तारीखे टोंक पुस्तक में मरहूम मौलवी सैयद असगर अली ने इस परंपरा के इतिहास का उल्लेख किया है। उनके अनुसार, महफिल-ए-मिलाद की शुरुआत हिजरी सन 1313 से कुछ पहले हुई थी। नवाब इब्राहिम अली खां के समय करीब 36 वर्षों तक इस महफिल का आयोजन कराया गया। बाद के इतिहासकारों ने भी उनके शासनकाल में आयोजित भव्य महफिलों का उल्लेख किया है।

महफिल में हजरत मुहम्मद साहब की सीरते पाक पर आधारित मिलाद और नज्में विशेष अंदाज में पढ़ी जाती हैं। सात दिनों तक चलने वाली इस धार्मिक परंपरा में श्रद्धालु और शहर के विभिन्न वर्गों के लोग शामिल होते हैं। रबीउल अव्वल महीने की शुरुआत के साथ नजर बाग पैलेस में इसका आयोजन विशेष महत्व रखता है। रियासत काल में महफिल-ए-मिलाद केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं थी, बल्कि इससे जुड़ी कई सामाजिक परंपराएं भी थीं। यौमे पैदाइश के अवसर पर कुछ कैदियों की सजा माफ कर उन्हें रिहा किए जाने का भी उल्लेख मिलता है। इसके अलावा मदरसों और पाठशालाओं में मिठाइयां वितरित की जाती थीं। पुराने समय में पूरे शहर में बड़े पैमाने पर मिठाई बांटे जाने की परंपरा थी। उस दौर में टोंक में बिजली की व्यवस्था नहीं थी, इसलिए महफिल के दौरान लालटेनों को आकर्षक ढंग से सजाकर रोशनी की जाती थी। नजर बाग के मैदान में आयोजन के लिए विशेष सजावट और भव्य इंतजाम किए जाते थे। रियासत काल में विदेशी मेहमानों के भी इस आयोजन में शामिल होने की बात इतिहास में मिलती है। आज भी महफिल-ए-मिलाद टोंक की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। नवाबी दौर से चली आ रही यह परंपरा पीढ़ियों से आगे बढ़ रही है और हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होकर धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं।